अस्मितामूलक साहित्य एवं आंदोलन

₹960

₹1,200

DETAILS
EDITED BY डॉ. अखिलेन्द्र प्रताप सिंह, शालिनी रत्नाकर, डॉ. प्रेमलता
ISBN 978-93-88998-03-1
EDITION 2019
LANGUAGE HINDI
BINDING HB
SIZE DEMY
PAGES 354
PUBLISHER AKHAND PUBLISHING HOUSE

इस पुस्तक में.... | हिन्दी साहित्य में उत्तर आधुनिकता के रूप में विमर्शों ने जोरदार उपस्थिति दर्ज कर यथास्थितिवादी साहित्य की जकड़ से लेखनी को बाहर निकाला। स्त्री विमर्श, दलित विमर्श, आदिवासी विमर्श, किन्नर साहित्य, आदि अस्मितामूलक विमर्शों ने हिन्दी साहित्य को व्यापक फलक पर पहुंचा दिया पर यह भी सत्य है कि पहले से कब्जा जमाये रूढ़िवादी साहित्यकारों को ये विमर्श नागवार गुजरे। अनेक अवरोधों और अनदेखी के बाद भी यह साहित्य अपने आप को स्थापित करने में सफल रहा। सदियों तक सवर्णो ने दलितों को, पुरूषों ने स्त्री को और इन सब ने आदिवासी एवं किन्नरों के अधिकारों को कुचलने का प्रयास किया और उनके अस्तित्व को स्वीकार करने में हमेशा आना-कानी की।

इस विमर्शमूलक साहित्य की सबसे अच्छी बात यह है कि यह यथार्थवादी साहित्य है। कल्पना और मनोरंजन का साहित्य न होकर यह आप बीती का साहित्य है। यह अस्मितामूलक साहित्य मौटे तौर पर लगभग छः दशकों से अपनी यात्रा कर रहा है। इन विमर्शो के हिन्दी साहित्य में उभार ने वास्तव में लोकतंत्र स्थापित किया है। सांस्कृतिक एवं साहित्यिक स्तर पर वर्तमान समय में जो विविधता आई है उसमें इन विमर्शों का बहुत बड़ा योगदान है।

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EDITED BY डॉ. अखिलेन्द्र प्रताप सिंह, शालिनी रत्नाकर, डॉ. प्रेमलता
ISBN 978-93-88998-03-1
EDITION 2019
LANGUAGE HINDI
BINDING HB
SIZE DEMY
PAGES 354
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