इकोफेमिनिज्म: भारतीय पर्यावरणीय आंदोलनों में महिलाओं की भूमिका

₹468

₹550

DETAILS
AUTHOR'S NAME डॉ. नमो नारायण
ISBN 978-81-19098-20-0
EDITION 2025
LANGUAGE HINDI
BINDING HB
SIZE DEMY
PAGES 208
PUBLISHER AKHAND PUBLISHING HOUSE

पुस्तक परिचय 

'इकोफेमिनिज्म' शीर्षक से लिखी इस पुस्तक में भारतीय पर्यावरणीय आंदोलनों में महिलाओं की भूमिका की वर्तमान भारतीय संदर्भ में समीक्षा की गई है। प्रस्तुत पुस्तक लेखक के शोध प्रबंध पर आधारित है जो भारत में पारिस्थितिकी नारीवादी के सैद्धांतिक, विचारधारात्मक और आंदोलनात्मक पक्षों का समीक्षात्मक अध्ययन करती है। 

नारीवाद और पर्यावरणवाद के बीच संबंध, जिसे अक्सर 'इकोफेमिनिज्म' के रूप में जाना जाता है, हाल के वर्षों में एक महत्वपूर्ण वैश्विक विमर्श के रूप में उभरा है। यह विचारधारा महिलाओं और प्रकृति दोनों के उत्पीड़न के बीच गहरे संबंध को पहचानती है, और यह तर्क देती है कि पितृसत्तात्मक व्यवस्था ने न केवल महिलाओं को अधीनस्थ किया है, बल्कि पर्यावरण का भी शोषण किया है। 

इस अवधारणा भारत समेत समूचे ग्लोबल साउथ में कई उल्लेखनीय आंदोलनों और विचारकों को जन्म दिया है, जिन्होंने वैश्विक पर्यावरणीय विमर्शको व्यापक रूप से प्रभावित किया है। 

ऐतिहासिक रूप से, भारत में महिलाएं पर्यावरणीय संरक्षण में अग्रणी भूमिका निभाती रही हैं। उनका गहरा संबंध अक्सर ग्रामीण समुदायों में उनकी पारंपरिक भूमिकाओं से उपजा है, जहां वे पानी, भोजन और ईंधन जैसे प्राकृतिक संसाधनों की प्राथमिक संग्राहक और प्रबंधक होती हैं। इस अन्योंन्याश्रित संबंध ने उन्हें पर्यावरणीय गिरावट के प्रभावों का प्रत्यक्ष अनुभव कराया है, जिससे वे पर्यावरण/ पारिस्थितिकीय संरक्षण की प्रबल समर्थक के रूप में उभरी हैं। 

भारत में सबसे प्रतिष्ठित पर्यावरणीय आंदोलनों में से एक चिपको आंदोलन था। 1970 के दशक में उत्तराखंड (तत्कालीन उत्तर प्रदेश का हिस्सा) में शुरू हुए इस आंदोलन में ग्रामीण महिलाओं ने अपनी आजीविका के लिए वन संपदा के संरक्षण में अग्रणी भूमिका निभाई और उन्हें गले लगाकर जंगल माफियाओं के हाथों कटने से बचाया था। 

इस आंदोलन ने केवल वनों की कटाई को ही सफलतापूर्वक नहीं रोका, बल्कि जमीनी स्तर पर पर्यावरणीय सक्रियता अभियानों को भी एक अभूतपूर्व ऊर्जा प्रदान की और दुनिया भर में इसी तरह के आंदोलनों को प्रेरित किया। 

एक और महत्वपूर्ण उदाहरण नर्मदा बचाओ आंदोलन है, जिसने स्थानीय जनजातियों को विस्थापन से संरक्षित करने एवं स्थानीय प्राकृतिक संपदा के संरक्षण हेतु नर्मदा नदी पर बड़े बांधों के निर्माण का विरोध किया। इस आंदोलन में मेधा पाटकर जैसी प्रमुख महिला पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने अविस्मरणीय भूमिका निभाई एवं महिलाओं को पर्यावरण संरक्षण हेतु नेतृत्वकारी भूमिका निभाने के लिए प्रेरित किया। 

इसी तरह, बिश्नोई समुदाय, जिसकी जड़ें 15वीं शताब्दी की हैं, पर्यावरणीय संरक्षण के लिए महिलाओं की प्रतिबद्धता का एक प्रमाण है। राजस्थान का यह समुदाय, जो अपने पारिस्थितिकी-केन्द्रित लोकाचार के लिए जाना जाता है, पर्यावरण संरक्षण का एक लंबा इतिहास संजोए हुए है, जिसमें महिलाएं सक्रिय रूप से वन्यजीवों और वनों के संरक्षण में भाग लेती हैं। 

वंदना शिवा, एक प्रसिद्ध भारतीय विद्वान और पर्यावरणविद्, इकोफेमिनिस्ट विचार की एक प्रमुख प्रतिपादक रही हैं। उन्होंने तर्क दिया है कि औद्योगिक कृषि और वैश्वीकरण ने न केवल महिलाओं को हाशिए पर धकेला है, बल्किजैव विविधता को भी नष्ट कर दिया है। अपने काम के माध्यम से, उन्होंने टिकाऊ कृषि पद्धतियों और स्थानीय समुदायों को सशक्त बनाने की वकालत की है। 

आज, भारतीय महिलाएं जलवायु परिवर्तन से लेकर प्रदूषण और संसाधन प्रबंधन तक के मुद्दों को संबोधित करते हुए विभिन्न पर्यावरणीय आंदोलनों का सफलतापूर्वक नेतृत्व कर रही हैं। वे न केवल अपने परिवारों और समुदायों की भलाई के लिए, बल्कि पूरे ग्रह के स्वास्थ्य के लिए भी महत्वपूर्ण हैं। 

“यहां भारत में इकोफेमिनिज्म को दर्शाती एक छवि है, जिसमें एक महिला पारंपरिक भारतीय परिधान पहने हुए है, जो हरे-भरे परिदृश्य के बीच एक पौधे को प्यार से पकड़े हुए है, जो प्रकृति के साथ उसके पोषण संबंध का प्रतीक है।" यह वक्तव्य भारत में इकोफेमिनिज्म और पर्यावरणीय आंदोलनों में महिलाओं की भूमिका की एक जटिल और गतिशील कहानी बयां करता है। यह लचीलापन, सक्रियता और प्राकृतिक दुनिया के साथ गहरे संबंध की कहानी है। जैसा कि दुनिया पर्यावरणीय चुनौतियों से जूझ रही है, भारत में महिलाओं के अनुभव और योगदान भविष्य के लिए मूल्यवान अंतर्दृष्टि और प्रेरणा प्रदान करते हैं। 


लेखक परिचय 

डॉ. नमो नारायण, वर्तमान में दयानन्द वैदिक (पी.जी.) कॉलेज उरई, जालौन, उ.प्र. (बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय, झांसी) में असिस्टेंट प्रोफेसर (राजनीति विज्ञान) के पद पर विगत 9 वर्षों से अध्यापन कार्य कर रहे हैं। डॉ. नमो ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से परास्नातक की शिक्षा प्राप्त की है। उन्होंने शिक्षाशास्त्र (एमएड) तथा विमेन एण्ड जेंडर स्ट्डीज में भी परास्नातक किया है। डॉ. नमो ने तीन विषयों (राजनीति विज्ञान, शिक्षाशास्त्र एवं विमेन स्ट्डीज) में प्रतिष्ठित यूजीसी नेट/जेआरएफ की परीक्षा उत्तीर्ण कर लखनऊ विश्वविद्यालय से  डॉक्टरेट (पीएचडी) की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने सिविल सेवा मुख्य परीक्षा सहित कई अन्य प्रतियोगी परीक्षाएं उत्तीर्ण की। वह प्रतियोगियों को सिविल सेवा और यूजीसी नेट/जेआरएफ जैसी प्रतिष्ठित प्रतियोगी परीक्षाओं हेतु मार्गदर्शन प्रदान करते हैं। डॉ. नमो भारतीय राजनीति विज्ञान परिषद (IPSA) तथा कुमारस्वामी फाउंडेशन, लखनऊ के आजीवन सदस्य हैं। साथ ही वह पुनरुत्थान विद्यापीठ, अहमदाबाद से भी संबद्ध हैं। डॉ. नमो अकादमिक क्षेत्र में एक कर्मठ सदस्य के रूप में कई राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों का हिस्सा रहे हैं। उनके 25 से अधिक शोध पत्र विभिन्न राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय संगोष्ठियों तथा शोध पत्रिकाओं (जर्नल्स) में प्रस्तुत और प्रकाशित हो चुके हैं। वह पुनरुत्थान सेवा ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित ‘भारतीय शिक्षा ग्रंथमाला ’ की पाठ्यक्रम निर्माण समिति एवं विभिन्न प्रशासनिक समितियों के सदस्य रह चुके है। ‘Indian Political Thought’ डॉ. नमो की अन्य प्रकाशित पुस्तक है।

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AUTHOR'S NAME डॉ. नमो नारायण
ISBN 978-81-19098-20-0
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