भारतीय संविधान ने जनजातियों को एक विशिष्ट समुदाय के रूप में मान्यता दी है। और धर्म के मामले में उसमें यह स्वतंत्रता दे रखी है कि जो जिस धर्म का अनुशरण करना चाहें करें। व्यवहार में जैसा कि जनगणना के आकड़ों से पता चलता है कि आदिवासियों की अपनी धार्मिक पहचान नहीं के बराबर है, वे धार्मिक पहचान दर्ज कराने के लिए कोई निश्चित जगह न पा कर, जनजातियों को अन्य धार्मिक समुदाय के साथ जुड़ने के लिये बाध्य होना पड़ता है। परिणामतः जनजाति के धार्मिक आस्था-विश्वासों में समानता होने पर भी हर समुदाय अपने धार्मिक पहचान अपने-अपने हिसाब से अलग-अलग बताने के लिए विवश है। हमारा मानना है। कि भारत का 8 प्रतिशत आदिवासियों की जनसंख्या हिन्दू के रूप में कर दी गई है जो कि सही नहीं है। जनजाति का प्राकृतिक धर्म जैसे सरना, गोंड़ी या आदिम धर्म से संबोधित किया जाता रहा है। जनजातियों में विश्वास रहा कि वे प्राकृतिक शक्तियों का प्राचीन काल से ही उपासक रहे हैं।
| DETAILS | |
| AUTHOR'S NAME | डॉ. कृपाराम ध्रुव |
| ISBN | 978-93-88998-17-8 |
| EDITION | 2019 |
| LANGUAGE | HINDI |
| BINDING | HB |
| SIZE | DEMY |
| PAGES | 373 |
| PUBLISHER | AKHAND PUBLISHING HOUSE |
