बस्तर में गोंड़ जनजातियों में धर्म और उनके बदलते प्रतिमान

₹880

₹1,100

DETAILS
AUTHOR'S NAME डॉ. कृपाराम ध्रुव
ISBN 978-93-88998-17-8
EDITION 2019
LANGUAGE HINDI
BINDING HB
SIZE DEMY
PAGES 373
PUBLISHER AKHAND PUBLISHING HOUSE

भारतीय संविधान ने जनजातियों को एक विशिष्ट समुदाय के रूप में मान्यता दी है। और धर्म के मामले में उसमें यह स्वतंत्रता दे रखी है कि जो जिस धर्म का अनुशरण करना चाहें करें। व्यवहार में जैसा कि जनगणना के आकड़ों से पता चलता है कि आदिवासियों की अपनी धार्मिक पहचान नहीं के बराबर है, वे धार्मिक पहचान दर्ज कराने के लिए कोई निश्चित जगह न पा कर, जनजातियों को अन्य धार्मिक समुदाय के साथ जुड़ने के लिये बाध्य होना पड़ता है। परिणामतः जनजाति के धार्मिक आस्था-विश्वासों में समानता होने पर भी हर समुदाय अपने धार्मिक पहचान अपने-अपने हिसाब से अलग-अलग बताने के लिए विवश है। हमारा मानना है। कि भारत का 8 प्रतिशत आदिवासियों की जनसंख्या हिन्दू के रूप में कर दी गई है जो कि सही नहीं है। जनजाति का प्राकृतिक धर्म जैसे सरना, गोंड़ी या आदिम धर्म से संबोधित किया जाता रहा है। जनजातियों में विश्वास रहा कि वे प्राकृतिक शक्तियों का प्राचीन काल से ही उपासक रहे हैं।

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AUTHOR'S NAME डॉ. कृपाराम ध्रुव
ISBN 978-93-88998-17-8
EDITION 2019
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